सतपाल जी महाराज का Holi Program

भारतीय संस्कृति में प्रत्येक त्यौहार के पीछे कुछ न कुछ तथ्य छिपा हुआ है। होली का पर्व भी एक ऐसा ही पर्व है जिसके बारे में आता है कि..

"जाको राखे साइयाँ मार सके ना कोय। बाल न बाँका कर सके जो जग बैरी होय।।" 

 अर्थात जिसके रक्षक स्वयं भगवान होते हैं उसका #संसार की कोई भी ताकत कुछ नहीं बिगाड़ सकती। भक्त प्रह्लाद के बारे में आता है कि वह अपने पिता हिरण्यकश्यप की अनेक यातनाओं के बाद भी श्री हरि की भक्ति से विमुख नहीं हुए और दिन - प्रतिदिन उनकी भक्ति और भी प्रगाढ़ होती गई। ईर्ष्यावश हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका ( जिसको अग्नि में भी न जलने का वरदान प्राप्त था ) से कहा कि तुम प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि के कुंड में बैठ जाओ। जिससे प्रहलाद की जीवन लीला समाप्त हो जाये क्योंकि वह मेरे बार-बार मना करने के बावजूद भी मुझे भगवान न मानकर विष्णु को अपना भगवान मानता है। 
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 भक्तवत्सल भगवान अपने भक्तों की सदैव रक्षा करते हैं। होलिका जब प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्निकुंड में बैठती है , तो होलिका जलकर समाप्त हो जाती है और प्रहलाद की रक्षा होती है। इसलिए हमेशा असत्य पर सत्य की विजय होती है। हर भक्त को चाहिए कि जिस भगवद् नाम की साधना करके प्रह्लाद ने भक्ति की दृढ़ता स्थापित की इसी तरह हम भी समय के महापुरुष की शरणागत होकर उनसे अध्यात्म ज्ञान की दीक्षा प्राप्त कर अपने जीवन का कल्याण करें।

आज हम मुँह काला - नीला करके होली मना लेते हैं , परंतु उस अद्भुत इतिहास को भूल जाते हैं कि प्रहलाद के पिता ने प्रहलाद को जलाने के लिए होलिका को कहा कि तुम प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठ जाओ , जिससे कि प्रहलाद अग्नि में भस्म हो जाये। 
होलिका के पास एक ऐसा वस्त्र था जो अग्नि में जलने से बचा लेता था। होलिका प्रहलाद को लेकर जब अग्नि में बैठी , तो उल्टा हो गया, होलिका जल गई,  प्रहलाद बच गया। 
      विचार करो , वह क्या शक्ति थी जिसे प्रह्लाद ने जागृत कर रखा था, वह क्या निष्ठा थी, वह क्या धर्म था , क्या ज्ञान था, जो प्रह्लाद ने प्राप्त किया था, जिससे अग्नि भी प्रहलाद का कुछ नहीं बिगाड़ पायी। आज हम होली तो मनाते हैं परंतु भूल जाते हैं उस प्रहलाद के हरि को, उस शक्ति को जिसने प्रहलाद की रक्षा की। प्रहलाद के उस इतिहास को हमने भुला दिया।

 इसलिए आज हमें अध्यात्म ज्ञान द्वारा चेतना के विकास से भारत की आत्मा को पुन: जागृत करना होगा। हमारे  ऋषियों का जो अध्यात्मवाद है ; नचिकेता, मैत्रयी और गार्गी का जो अध्यात्मवाद है उसे भारत में पुन: स्थापित करना होगा, अपने जीवन में उस अध्यात्मवाद को धारण करना होगा। हम कैसे अपने जीवन को वैसा बना सकते हैं, इस पर हमें विचार करना होगा और अपने जीवन में उन सद्गुणों को धारण करना होगा  पर यह सब तभी होगा जब हम प्रभु के उस परम पावन नाम को, उस आदिस्पंदन को जानेंगे जो हर प्राणी के अंदर है। उस नाम की शक्ति से यह बदलेगा, दानवता से ग्रस्त मानव फिर से मानव बनेगा और युग परिवर्तन होगा। 

जिस प्रकार बीज हम अपने कमरे में भी रखते हैं, बोरियों में भी होता है तथा बीज के बड़े-बड़े भंडार भी होते हैं, परंतु वहां उगता नहीं है। बीज उगाने के लिए किसान खेत को उपजाऊ बनाता है बीज उसमें रोपित करके उसमें खाद पानी देता है। हवा, धूप, खाद और पानी मिलने पर वह बीज भी धीरे-धीरे प्रकट होता है - उसी प्रकार परमात्मा सबके हृदय में चराचर जगत में विद्यमान है परंतु जब सद्गुरुदेव महाराज सेवा, भजन, सत्संग तथा दर्शन के माध्यम से आत्मज्ञान करा देते हैं तब हमारे अंदर बीज रूप में छिपे परमात्मा प्रकट हो जाते हैं।

संसार को सागर की उपमा दी जाती है। सागर में जल होता है जिसमें लहरें उठती हैं, उसमें अनेक प्रकार के जलचर रहते हैं । इसी प्रकार संसार रुपी सागर में #विषयरुपी जल भरा रहता है जिसमें #काम, #क्रोध, #लोभ, #मोह और #अहंकार आदि जलचल जीवों को पकड़-पकड़कर मार रहे हैं । 
      नदी के दो किनारे होते हैं, एक को इस पार और दूसरे को परली पार कहते हैं । इसी प्रकार संसार का यह पार जन्म-मरण और माया का है और परली पार भगवान को पाना अर्थात् मोक्ष प्राप्त करना है । 
      भगवान श्रीकृष्ण भी अर्जुन और दुर्योधन को यही समझाते हैं कि एक ओर तो मेरा सब राजपाट और सब सेना है तथा दूसरी तरफ मैं अकेला हूँ, जो तुम्हें पसन्द हो ले लो । तब अर्जुन ने सब  सहारों को छोड़ भगवान को लिया, इसलिए उसकी विजय हुई, पर दुर्योधन ने फौज और खजाना लिया जिस कारण उसकी हार हुई।
     संसार रुपी युद्ध में जो संसार के वैभव अर्थात् राजपाट नाच-रंग में लगे हुए हैं वे इन्हीं को मांगते रहेंगे, वे इसी पार रहेंगे पर जो इन सबको त्यागकर भगवान की ओर लग जायेंगे वे उस पार अर्थात उस परम् ज्योति में समा जायेंगे, जहाँ से लौटकर आना नहीं पड़ता, उसी का नाम परली पार या मोक्ष है | अब हमारी मर्जी है संसार में लगे रहो या भगवान की ओर लग जाओ। 
      सद्गुरु का शब्द जहाज है, इसमें जो कोई भी बैठेगा वह अवश्य पार हो जायेगा, पर जो इसमें से कूद गया तो रह ही गया।‌

खूनी क्रांतियां लोगों को काट सकती है, मानवता पैदा नहीं कर सकती। यह शक्ति तो अध्यात्म में ही है जिसने अंगुलिमाल जैसे व्यक्ति को भिच्छुक और रत्नाकर जैसे व्यक्तियों को महर्षि बना दिया। जब वह अध्यात्म ज्ञान ही हमारे समाज में नहीं होगा तो हमारी शिक्षा थोथी होती हो जाएगी, समाज में परिवर्तन नहीं होगा बल्कि समाज धीरे-धीरे और विनाश की तरफ बढ़ता चला जायेगा। आज हम देखते हैं कि जब-जब भी हम अध्यात्मवाद की चर्चा करते हैं तब-तब हमारा समाज आंखें बंद कर लेता है पर एक समय ऐसा आ रहा है जबकि समाज को अध्यात्म-ज्ञान अंगीकार करना पड़ेगा।
     विचार करो, जब हमारे माता-पिता एक हैं, हम सब आदम-हौवा, मनु-शतरूपा या एडम-इव की संताने हैं, जब हम सबको बनाने वाला एक ही परम पिता परमात्मा है। हम भिखारी नहीं बल्कि परमपिता परमात्मा ने हमारे अंदर अध्यात्म का सबसे बड़ा खजाना दे रखा है पर फिर भी हम दुःखी है, क्यों? क्योंकि हम उस अध्यात्म को न जानकर माया के क्षणिक सुखों के पीछे भाग रहे हैं। इसीलिए हमें अध्यात्म को जानना होगा।
      अध्यात्म किसी जाति का नाम नहीं, किसी संप्रदाय का नाम नहीं या किसी खास वर्ग की धरोहर नहीं बल्कि संपूर्ण मानव जाति का और संपूर्ण मानव जाति के लिए है। इसी अध्यात्म ज्ञान का प्रचार हमें सारे विश्व में करना है। इसके लिए विशेषकर भारत के भक्तों को कुर्बानी देनी होगी। हम अगर वास्तव में महापुरुष के शिष्य हैं तो हमें उनके अध्यात्म ज्ञान प्रचार-प्रसार को आगे बढ़ाना होगा।

मैं पूछता हूं- इतने वर्षों के बाद भी हमारे समाज ने किसी महाराणा प्रताप को पैदा किया? किसी शिवाजी को पैदा किया? लक्ष्मीबाई, मीराबाई, सहजोबाई जैसी वीरांगनाओं को जन्म दिया? क्यों, इसका क्या कारण है? कारण यह है कि जब बाप अपने बेटे से कहेगा कि बेटा!  बोतल लाओ तो बेटे पर क्या असर पड़ेगा? वह बच्चा शिवाजी कैसे बनेगा? वह बच्चा महाराणा प्रताप कैसे बनेगा? तो मैं आप लोगों से यही कहूंगा कि इसके लिए सबसे पहले हमें अपने चरित्र को बदलना होगा तभी हमारे बच्चे चरित्रवान होंगे। मैं चाहता है और मेरी प्रबल इच्छा है कि सभी पाठशालाओं में बच्चों को सचरित्रता की शिक्षा दी जाय, सभी स्कूलों में चरित्र निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाय, शिक्षा के माध्यम से बच्चों के मस्तिष्क में यह संस्कार डाला जाय कि "आनंद" जीवन का लक्ष्य नहीं बल्कि चरित्र निर्माण जीवन का लक्ष्य है। जब बच्चे चरित्रवान होंगे तो उन्हीं बच्चों में से कोई शिवाजी होगा, कोई महाराणा प्रताप होगा जो भारत के महान गौरव को पुनः स्थापित करेगा।

जब-जब धर्म की हानि होती है, मर्यादाएं लुप्त हो जाती हैं, लोगों को सद्मार्ग सूझता नहीं है, भ्रमित हो जाते हैं, तब-तब मर्यादा की स्थापना के लिए, सत्य की रक्षा के लिए, सत्य का अवतार अपनी शक्तियों के साथ इस धराधाम पर होता है। जब उस शक्ति का कार्य केवल ज्ञान देना ही होता है तो वह गुरु रूप में प्रकट होती है पर जब वह शक्ति ज्ञान देने के साथ-साथ धर्म की स्थापना भी कराती है तो वह भगवान रूप में प्रकट हो एक नये युग का निर्माण करती है।

  मानव केवल आत्मा के स्तर पर ही एकत्व का बोध कर पाता है क्योंकि आत्मा एक गुहृयतम कड़ी है जो कि सारे विश्व को आपस में जोड़े हुए हैं। शरीर और मन के स्तर पर उसकी अभिव्यक्ति विविध रूप धारण कर लेती है। यही है सौंदर्य जो विविधता में प्राप्त होता है। यद्यपि सत्य एक ही है लेकिन उसकी अभिव्यक्ति के रूप अनेक हो सकते हैं। इसी प्रकार से धर्म जो सत्य का विज्ञान है उसकी अभिव्यक्ति मन और बुद्धि के स्तर पर भिन्न-भिन्न है। यद्यपि मानव का शरीर एवं मन उस स्व-प्रकाशित आत्मा से ही प्रकाशित हो रहा है फिर भी उसकी अभिव्यक्ति विविध रूपों में परिलक्षित होती है। भिन्न-भिन्न धर्म वास्तव में एक ही धर्म के स्वरूप हैं। यदि सब धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो कुछ भिन्नताओं के बावजूद उसके अंतराल में स्वभाविक तारतम्य प्राप्त होता है। वह एक जैसे प्रतीत होते हैं। केवल दृष्टि-भेद से भिन्न भिन्न दिखाई देते हैं। इसीलिए धर्मों को समझाने के लिए, उन्हें तत्व से जानने के लिए ज्ञान दृष्टि आवश्यक है। ज्ञान दृष्टि में यही क्षमता है कि वह धर्मों के सारभूत रूप से निहित तत्व धर्म को दृष्टिगोचर कर पाती है। अज्ञान की दृष्टि से धर्म केवल विभिन्न ही नहीं दिखाई देते बल्कि विरोधी भी दिखाई देते हैं। ज्ञान की दृष्टि तो एक ही है लेकिन अज्ञान की दृष्टियां अनेक है। वास्तविकता तो यह है कि अज्ञान कोई दृष्टि ही नहीं है। वह केवल दृष्टि भासती है। वह तो केवल अंधापन है। अंधकार में अनेक दृष्टि हैं। यह बिल्कुल ठीक ही कहा गया है कि सौ सयानों का एक ही मत होता है। इसीलिए धर्म का संबंध है ज्ञान चक्षु से। जिसका ज्ञान चक्षु बंद है उनके लिए धर्म अंधों के हाथी के समान है वे अपनी कल्पना से, अपने संस्कारों से जो उन्होंने समाज एवं संप्रदायों से इकट्ठे किए हैं, धर्म का मन गढ़ंत स्वरूप बना लेते हैं और उसे सत्य मान लेते हैं। धर्म के नाम पर लड़ाई अंधों की लड़ाई है और वह तब तक दूर नहीं हो पाएगी जब तक कि ज्ञान-दृष्टि की उपलब्धि न हो।

    यह बात भी मत भूलो कि आप स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हैं। आप चाहो तो अपने जीवन को महान बना सकते हो और चाहे अपने जीवन को निकृष्ट बना सकते हो; चाहे आप अपने जीवन के अंदर फूलों की कलियां खिला दो, चाहे अपने जीवन के अंदर कांटे बो दो; चाहे आप देववृत्ति को अपना लो, चाहे आप राक्षस बन जाओ। यह निर्णय आपको करना है कि मुझे किस रास्ते पर चलना है, कौन-सा मार्ग अपनाना है। उपनिषदों के अंदर दो मार्गों का विवेचन हुआ है - श्रेयमार्ग और प्रेयमार्ग। श्रेयमार्ग, वह आध्यात्मिक मार्ग है जिस पर हमारे अवतार, पीर -पैगंबर, ऋषि-मुनि आदि लोग चले तथा प्रेयमार्ग वह भौतिकवाद का मार्ग है जिसमें व्यक्ति माया की वस्तुओं में आसक्त हो करके उस मायापति को भूल जाता है और अपनी आत्मा का हनन कर लेता है। इसीलिए प्रेयमार्ग को छोड़कर श्रेयमार्ग को अपनाओ तथा ऋषि-मुनियों के कदमों पर चलते हुए अपने जीवन को महान बनाओ।

       एक बार हमारे पास कुछ लोग आये, कहने लगे- महाराज जी ! आप "मानव धर्म सम्मेलन" नाम को हटाकर "हिंदू धर्म सम्मेलन" रख दो। मैंने कहा - भाई एक हिंदू के अलावा औरों का उद्धार कैसे होगा? अगर हम मात्र हिंदू धर्म ही अपनाये, केवल उसी की चर्चा करें तो हम सारी मानवता का उद्घार नहीं कर सकते। इसलिए हमारा धर्म "मानव धर्म" है जिसमें जाति-पाति, संप्रदाय की संकुचित भावना नहीं।
       हमारा हमेशा यह प्रायोजन रहता है कि यह ज्ञान सबको मिले। आत्मज्ञान जो कि सभी धर्मों का सार है, उसकी चर्चा, उस ईश्वर की चर्चा मानवमात्र के लिए है, आप सब लोगों के लिए है । यही हमारे मुस्लिम भाइयों के लिए भी है, हमारे ईसाई भाइयों के लिए भी है, बौद्धिष्ट भाइयों के लिए भी है, सिख भाइयों के लिए भी है और हमारे सनातनी भाइयों के लिए भी है।
     जब सूरज, धरती, हवा, पानी, आकाश आदि सभी सबके लिए बने हैं, जब हर आदमी सांसों के आधार पर ही जीवित रहता है, उन स्वांसो को जब एक ही ईश्वर की शक्ति चलाती है तो वह ईश्वर और उसका ज्ञान भी मानव-मात्र की के लिए एक ही है।
      वह धर्म जो सबके लिए एक है, जो जाति-पाति, संप्रदायों की दीवारों में नहीं बंधता उसी मानव धर्म का प्रचार "मानव धर्म सम्मेलन" के द्वारा आज भारत के कोने-कोने में हो रहा है और लाखों मानव उस आत्मज्ञान को प्राप्त कर अपनी आत्मा का विकास कर रहे हैं। यहां तक कि जो लोग जंगलों में रहते हैं, जो आदिवासी जीवन व्यतीत कर रहे हैं उन लोगों को भी आत्मज्ञान का उपदेश हो रहा है और उनके अंदर परिवर्तन हो रहा है
यह संसार एक हाट (बाजार) है, इस हाट में प्रेम है, प्रेम को पाने के लिए कोई तैयार नहीं है। इसके दुकानदार समय के सतगुरु महाराज है। दुनिया आज सांसारिक प्रेम को पाने की ललक में लगी है, मगर वह क्षणिक सुख है, भौतिक सुख है। वास्तव में प्रेम परमात्म स्वरुप है, उसको पाने के लिए ही सतगुरुदेव महाराज प्रेरित करते हैं। प्रेम शब्द सांसारिक नहीं, भौतिक नहीं, अध्यात्मिक जगत का, अन्तर्जगत का साम्राज्य है। परमात्मा ही प्रेम है, प्रेम ही परमात्मा है परंतु आज भौतिक चकाचौंध में दुनिया प्रेम का मतलब कुछ और ही समझ रही है। प्रेम रूपी भक्ति जल के बिना हृदय की मलिनता दूर नहीं होगी।
    योगी, सन्यासी चाहे कोई भी हो, यदि समय के सद्गुरु के चरणों में प्रेम नहीं है तो वह सतगुरु के देश को नहीं जान सकता। जैसी प्रीत अपने पुत्र, नारी, माता-पिता एवं अपने इष्ट- मित्रों में होती है, ऐसी ही प्रीत सतगुरु महाराज से हो जाये तो वैकुंठ जाने से कोई रोक नहीं सकता। यदि संसार की प्रीत को छोड़कर केवल परमात्मा के नाम में मन को लगा दो तो फिर जन्म मरण के दु:खदायी चक्र से तुम छूट जाओगे। संसार की प्रीत नाना प्रकार की होती है, पर उत्तम प्रेम वही है जो सद्गुरु से होता है।

#माया_मोह_रूपी_छिद्र_को_ज्ञान_से_ही_समाप्त_किया_जा_सकता_है।

एक शिष्य अपने गुरु महाराज जी के पास आकर कहता है कि गुरु महाराज जी! एक जीव ऊंचे पद से क्यों गिर जाता है? तो गुरु महाराज जी कहते हैं बेटा इसका उत्तर हम तुम्हें कल देंगे। अगले दिन प्रात:काल शिष्य अपने गुरु महाराज जी के श्री चरणों के समीप आता है और गुरु महाराज जी उसे दो छोटे मटके देते हैं और उनमें दो-दो पत्थर रखकर कहते हैं इनको नदी में छोड़ दो तो पहले वाला मटका जो छिद्ररहित है था वह नदी के बहाव में बहते-बहते एक किनारे से दूसरे किनारे पर जाकर लग जाता है और दूसरा मटका जिसमें कई छिद्र थे वह कुछ ही दूरी तैरने के बाद नदी में डूब जाता है।
     शिष्य पूछता है गुरु महाराज जी! पहले वाला मटका क्यों तैर करके नदी के दूसरे किनारे पर जा लगा और दूसरा थोड़ी ही दूर नदी मैं तैरकर क्यों डूब गया? तब गुरु महाराज जी कहते हैं कि हे वत्स! दूसरा घड़ा छिद्र वाला था, ऐसे ही कुछ जीवों का हृदय काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार रूपी छिद्र वाला हो जाता है जिससे वह गुरु दरबार में ऊंची पद-प्रतिष्ठा पाकर भी एक दिन वह नीचे गिर जाता है, वह छिद्र वाले पात्र की तरह एक दिन इस संसार रूपी भवसागर में माया-मोह, भौतिक चकाचौंध रुपी छिद्र के कारण डूब जाता है। इसीलिए प्रत्येक जीव को इस विकार से दूर रहना होगा, तभी वह संसार रूपी भवसागर को पार कर सकता है। इसीलिए हमें भी जीवन में इन विकारों की बुराइयों से सदा दूर रहना होगा। ये विकार तभी दूर होंगे जब हम नित्य नियम से गुरु महाराज जी के द्वारा बताये गये अध्यात्म ज्ञान (परमपिता परमात्मा के अमृत नाम व स्वरूप का स्वाध्याय) का ध्यान व भजन-सुमिरन करते रहेंगे।

#राग_द्वेष_से_उपराम : #ईसा_मसीह
    ईसा मसीह के जीवन से यह ज्ञात होता है कि वे राग-द्वेष, छल-कपट, एक दूसरे के प्रति घृणा से उपराम थे। ईसा मसीह के बताये हुए ज्ञान-आदर्शों के रास्ते पर जिस भी संसारी मनुष्य ने संकल्पबद्ध होकर चलने का प्रयास किया वह परमपिता परमात्मा की मंजिल तक पहुंचा और संसार-सागर से पार हो गया।
    ईसा मसीह ने अपने उपदेशों में कहा कि वह परमपिता परमात्मा कण-कण में व्याप्त है। सबसे प्रेम करना सीखो। द्वेष करना दानवत्व प्रवृत्ति है। यह जगत परमात्मा का बगीचा है। यहां पर हर व्यक्ति एक फूल है। धन्य है वे लोग जो ज्ञान के पिपासु है क्योंकि उन्हीं की भूख तृप्त की जायेगी जो जिज्ञासु हैं। धन्य है जीजु नम्रता के आभूषण हैं क्योंकि वही उस परमपिता परमात्मा के खजाने को पाने के अधिकारी हैं धन्य हैं वे जो राग द्वेष से परे हैं इस संसार में उस परमपिता परमात्मा की संतान कहलाने योग्य वही है जो एकनिष्ठ होकर उनकी आज्ञा का पालन करते हैं।
      ईसा मसीह ने उस ज्ञान के उपदेश को हर वर्ग के लोगों को दिया और कहा कि जीवन में किसी भी जीव के प्रति राग-द्वेष नहीं करना चाहिए। सबसे प्रेम करना चाहिए। जब हम प्रेम करना प्रारंभ कर देते हैं तो हम धीरे-धीरे उस परमपिता परमात्मा के समीप पहुंचने लगते हैं। जिन्होंने अपने जीवन में प्रभु के पावन नाम का स्मरण किया वही वास्तव में स्वर्ग के साम्राज्य के अधिकारी बनेंगे।
     इसीलिए आइये, हम भी सद्मार्ग की तरफ अग्रसर हो। अपने जीवन में उन महापुरुषों के आदर्शों को अपनाते हुए वर्तमान समय के तत्वदर्शी महापुरुष की तलाश करें जो हमारे जीवन को राग-द्वेष से उपराम कर उस परमपिता परमात्मा के पावन नाम व स्वरूप का बोध करा दें।
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